तुझको पता है मेरी जरूरत का | Lyrics song
तुझको पता है मेरी जरूरत का, मेरे खुदा – 2
इसे पूरा करदे, मेरे सोहणे नासरी -2,
तुझको पता है….
1. सोने के महलों में मुझे नहीं रहना,
मुझे तो बस तेरे कदमों में रहना -2
मेरी सुणले दुआ, मेरे सोहणे नासरी -2,
तुझको पता है ….
2. दुनियां की चीज़ों की, नहीं अभिलाषा,
मुझकों ज़रा सी भी नहीं अभिलाषा – 2
मेरा हो जा, मुझे ले अपना बना -2,
तुझको पता है….
3. मांगने से पहले, ही तू देने वाला,
हद से भी ज्यादा है तू देने वाला -2
मैं कम हो जाऊं, मुझमें तू बढ़ता जा 2,
तुझको पता है …..
गीत का आत्मिक सारांश (Song Summary)
यह गीत एक विश्वासी के दिल की गहरी पुकार है, जो संसार की भौतिक वस्तुओं को छोड़कर पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा और उसकी उपस्थिति के प्रति समर्पित होना चाहता है। गीत का मुख्य विषय परमेश्वर की सर्वज्ञता (सब कुछ जानना), संतोष, नम्रता और मसीह में आत्मिक बढ़ोत्तरी है।
गायक अपने प्रभु (सोहणे नासरी – नासरत के सुंदर यीशु) को अपनी सभी जरूरतों का स्रोत मानता है। वह सोने के महलों या दुनिया की धन-दौलत की इच्छा नहीं करता, बल्कि प्रभु के चरणों में रहने को ही अपना सबसे बड़ा सौभाग्य समझता है। यह गीत इस बात पर गहरा विश्वास व्यक्त करता है कि हमारा परमेश्वर हमारी प्रार्थना करने से पहले ही हमारी आवश्यकताओं को जानता है और अपनी महिमा के धन के अनुसार हमें बहुतायत से देता है। अंत में, यह गीत यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले की तरह एक महान आत्मिक समर्पण को दर्शाता है: “मैं घटूँ और मसीह मुझमें बढ़े।”
गीत से जुड़े बाइबल के मुख्य वचन और स्पष्टीकरण (Bible Verses & Explanation)
इस गीत के एक-एक अंतरे का बाइबल के वचनों के साथ गहरा संबंध है। नीचे उन वचनों को उनके स्पष्टीकरण के साथ पूरा लिखा गया है:
1. परमेश्वर हमारी आवश्यकताओं को जानता है और पूरा करता है
मत्ती 6:8 — “इसलिए तुम उनके समान न बनो, क्योंकि तुम्हारा पिता तुम्हारे मांगने से पहले ही जानता है कि तुम्हारी क्या-क्या आवश्यकताएं हैं।”
स्पष्टीकरण: गीत की मुख्य पंक्ति “तुझको पता है मेरी जरूरत का…” सीधे प्रभु यीशु के इस वादे से मेल खाती है। विश्वासियों को अपनी चिंताओं में डूबने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि हमारा स्वर्गीय पिता हमारे शब्दों को बोलने से पहले ही हमारे दिल की जरूरत को जानता है।
2. महलों से बढ़कर प्रभु की उपस्थिति की चाह
भजन संहिता 84:10 — “क्योंकि तेरे आँगनों में का एक दिन और कहीं के हजार दिन से उत्तम है। दुष्टों के तम्बुओं में वास करने से अपने परमेश्वर के भवन की ड्योढ़ी पर खड़ा रहना ही मुझे अधिक भाता है।”
स्पष्टीकरण: गीत का पहला अंतरा कहता है, “सोने के महलों में मुझे नहीं रहना, मुझे तो बस तेरे कदमों में रहना…”। यह दाऊद के भजनों की याद दिलाता है, जहाँ संसार के ऐशो-आराम और महलों की तुलना में परमेश्वर की संगति और उसके चरणों में बैठने (ड्योढ़ी पर खड़े रहने) को सबसे श्रेष्ठ माना गया है।
3. सांसारिक चीजों की अभिलाषा का त्याग
1 यूहन्ना 2:15-16 — “तुम न तो संसार से और न संसार में की वस्तुओं से प्रेम रखो। यदि कोई संसार से प्रेम रखता है, तो उसमें पिता का प्रेम नहीं है। क्योंकि जो कुछ संसार में है, अर्थात शरीर की अभिलाषा, और आँखों की अभिलाषा और जीविका का घमण्ड, वह पिता की ओर से नहीं, परन्तु संसार ही की ओर से है।”
स्पष्टीकरण: जब गीत में कहा जाता है, “दुनिया की चीज़ों की, नहीं अभिलाषा…” तो यह इस वचन को व्यावहारिक रूप में प्रकट करता है। एक सच्चा मसीही जीवन संसार के लालच से मुक्त होकर केवल मसीह को अपना बनाने की चाह रखता है।
4. मांगने से पहले और बहुतायत से देने वाला परमेश्वर
इफिसियों 3:20 — “अब जो ऐसा समर्थ है कि हमारी विनती और समझ से कहीं अधिक बढ़ाकर काम कर सकता है, उस सामर्थ्य के अनुसार जो हम में कार्य करता है।”
स्पष्टीकरण: तीसरे अंतरे की पंक्तियाँ “मांगने से पहले ही तू देने वाला, हद से भी ज्यादा है तू देने वाला…” इस बात की गवाही देती हैं कि परमेश्वर हमारी सोच और कल्पना से भी कहीं बढ़कर (हद से ज्यादा) आशीषें देने में सक्षम है। वह एक उदार और दयालु पिता है।
5. स्वयं का घटना और मसीह का बढ़ना (पूर्ण समर्पण)
यूहन्ना 3:30 — “अवश्य है कि वह बढ़े और मैं घटूँ।”
स्पष्टीकरण: गीत की अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण प्रार्थना है, “मैं कम हो जाऊं, मुझमें तू बढ़ता जा…”। यह सीधे यूहन्ना बपतिस्मा देने वाले के शब्दों को दर्शाता है। इसका अर्थ है कि हमारा अहंकार, हमारा ‘मैं’ और हमारा पुराना स्वभाव ख़त्म हो जाए, और हमारे जीवन से केवल प्रभु यीशु मसीह का स्वभाव, उसका प्रेम और उसकी महिमा प्रकट हो।
निष्कर्ष: यह गीत केवल होंठों की आराधना नहीं है, बल्कि एक मसीही जीवन का संपूर्ण मार्गदर्शक है। यह हमें सिखाता है कि हम दुनिया कीTemporary (क्षणिक) चीज़ों के पीछे भागने के बजाय, उस शाश्वत (Eternal) परमेश्वर के पीछे भागें जो हमारी हर कमी को अपनी बहुतायत से पूरा करता है।


