मुझको छु लै तू ऐ पाक रूह lyrics song
मुझको छु लै तू ऐ पाक रूह,
अपनी बातें तूं मुझको सुणा …….. 2
मैं तो मंदिर यहोवा का हूँ,
मेरा जीवन बणा दे नया …… 2
1. जैसे आग में सोना ढले
तेरे वचनों में ढलता रहूं …
मेरी आखों को तूं खोल दे
तेरी राहों पे चलता रहूं …
जैसे मर्जी तेरी हो खुदा, …. 2
तेरे पिछे मैं चलता रहूं
मुझको छु लै तू ऐ पाक रूह,
अपनी बातें तूं मुझको सुणा …. 2
2. जैसा तू मुझको कहे,
वो ही मैं करता रहूं
कामिल बणा दे मुझे,
रूह के फलो से भरू …. 1
राहें बदल मेरी सोचें बदल, …. 2
आनद मुझमे तूं पा
मुझको छु लै तू ऐ पाक रूह,
अपनी बातें तू मुझको सुणा …. 2
मैं तो मंदिर यहोवा का हूँ,
मेरा जीवन बणा दे नया …… 2
3. बिन तेरे कुछ बी नहीं
तू है जरूरत मेरी … 1
मुझमे नज़र आए,येशु सूरत तेरी …. 2
छिपने की तू ही जगाह है मेरी … 2
तू ही है मेरी पनाह
मुझको छु लै तू ऐ पाक रूह,
अपनी बातें तूं मुझको सुणा …… 2
गीत का आध्यात्मिक सारांश (Spiritual Summary)
इस गीत का मुख्य केंद्र पवित्र आत्मा का स्पर्श है। गीत की शुरुआत एक समर्पण भरी विनती से होती है कि पवित्र आत्मा विश्वास योग्य जन को छुए और उसे परमेश्वर की गुप्त बातें और वचन सुनाए। यह हमें सिखाता है कि मसीही जीवन अपनी शक्ति से नहीं, बल्कि आत्मा की सामर्थ्य से चलता है।
गीत में ‘यहोवा का मंदिर’ होने का उल्लेख है, जो एक बहुत ही गहरा सत्य है। एक मसीही का शरीर केवल मांस-लोहू नहीं, बल्कि जीवित परमेश्वर का निवास स्थान है। गायक प्रार्थना करता है कि उसका जीवन नया बनाया जाए, जैसे आग में तपने के बाद सोना शुद्ध हो जाता है। यह शुद्धिकरण की प्रक्रिया कठिन हो सकती है, लेकिन यह हमें मसीह के स्वरूप में ढालने के लिए आवश्यक है।
गीत का दूसरा महत्वपूर्ण भाग ‘आज्ञाकारिता’ और ‘परिवर्तन’ है। यहाँ अपनी इच्छा को त्यागकर परमेश्वर की मर्जी (जैसी मर्जी तेरी हो खुदा) को सर्वोपरि रखा गया है। यह गीत माँग करता है कि हमारी सोच, हमारी राहें और हमारा स्वभाव बदल जाए ताकि दुनिया को हममें ‘यीशु की सूरत’ दिखाई दे। अंत में, यह स्वीकार किया गया है कि प्रभु के बिना मनुष्य कुछ भी नहीं है; वह हमारी एकमात्र पनाह और जरूरत है।
गीत से जुड़े पवित्र शास्त्र (बाइबल) के वचन और स्पष्टीकरण
इस गीत के भावों को समझने के लिए निम्नलिखित बाइबल वचन अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:
1. पवित्र आत्मा का निवास और शरीर का मंदिर होना: गीत में कहा गया है कि “मैं तो मंदिर यहोवा का हूँ”। यह पवित्र शास्त्र के इस वचन पर आधारित है:
“क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारा शरीर पवित्र आत्मा का मन्दिर है, जो तुम में बसा हुआ है और तुम्हें परमेश्वर की ओर से मिला है; और तुम अपने नहीं हो?” (1 कुरिन्थियों 6:19) स्पष्टीकरण: यह वचन हमें याद दिलाता है कि यदि हम पवित्र आत्मा के मंदिर हैं, तो हमें अपने जीवन को पवित्र रखना चाहिए ताकि प्रभु की उपस्थिति हममें बनी रहे।
2. नया जीवन और नवीनीकरण: “मेरा जीवन बना दे नया” की पुकार इस वचन को पूरा करती है:
“इसलिये यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है: पुरानी बातें बीत गई हैं; देखो, वे सब नई हो गई हैं।” (2 कुरिन्थियों 5:17) स्पष्टीकरण: जब पवित्र आत्मा हमें छूता है, तो वह हमारे पुराने स्वभाव, पापों और बुरी आदतों को मिटाकर हमें एक नई पहचान देता है।
3. आग में सोने के समान शुद्धिकरण: गीत की पंक्ति “जैसे आग में सोना ढले” परमेश्वर की परखने वाली सामर्थ्य को दर्शाती है:
“परन्तु वह जानता है कि मैं कैसी चाल चला हूँ; और जब वह मुझे ता लेगा तब मैं सोने के समान निकलूंगा।” (अय्यूब 23:10) स्पष्टीकरण: जैसे सोना आग में तपकर अपनी अशुद्धियों को छोड़ देता है, वैसे ही पवित्र आत्मा हमारे दुखों और परीक्षाओं के माध्यम से हमें मसीह के लिए बहुमूल्य बनाता है।
4. मार्ग दर्शन और आँखों का खुलना: “मेरी आँखों को तू खोल दे, तेरी राहों पे चलता रहूँ” के लिए दाऊद का यह भजन सटीक है:
“मेरी आंखें खोल दे, कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूं।” (भजन संहिता 119:18) स्पष्टीकरण: आत्मिक सत्य को समझने के लिए केवल शारीरिक आँखें काफी नहीं हैं; हमें पवित्र आत्मा की प्रकाशना (Revelation) की आवश्यकता है।
5. आत्मा के फल और सिद्धता (कामिल बनना): “कामिल बना दे मुझे, रूह के फलों से भरूँ” की प्रार्थना इस वचन से संबंधित है:
“परन्तु आत्मा का फल प्रेम, आनन्द, शान्ति, धीरज, दया, भलाई, विश्वास, नम्रता, और संयम हैं; ऐसे ऐसे कामों के विरोध में कोई व्यवस्था नहीं।” (गलातियों 5:22-23) स्पष्टीकरण: एक परिपक्व मसीही वही है जिसके जीवन से पवित्र आत्मा के ये गुण दिखाई दें।
6. सोच और विचारों का परिवर्तन: “सोचें बदल, राहें बदल” की विनती मसीही जीवन का आधार है:
“और इस संसार के सदृश न बनो; परन्तु तुम्हारी बुद्धि के नये हो जाने से तुम्हारा चाल-चलन भी बदलता जाए, जिससे तुम परमेश्वर की भली, और भावती, और सिद्ध इच्छा अनुभव से मालूम करते रहो।” (रोमियों 12:2) स्पष्टीकरण: हमारी सोच ही हमारे कार्यों को जन्म देती है, इसलिए आत्मा के द्वारा मन का नया होना अनिवार्य है।
7. परमेश्वर हमारी पनाह और जरूरत: “तू ही है मेरी पनाह” गीत का अंतिम सत्य है:
“परमेश्वर हमारा शरणस्थान और बल है, संकट में अति सहज से मिलने वाला सहायक।” (भजन संहिता 46:1) स्पष्टीकरण: संसार में कोई भी स्थान सुरक्षित नहीं है, सिवाय परमेश्वर की उपस्थिति के।
यह गीत और ये वचन हमें सिखाते हैं कि हमें हर दिन पवित्र आत्मा की अगुवाई में चलना चाहिए ताकि हम मसीह की ज्योति बन सकें।


