मैंनू जो कुछ चाहिदा | Lyrics song
ना आस रखां दुनियां ते,
ना आसरा लैणा ऐ मैंनू जो कुछ चाहीदा,
येशु कोलो लैना ऐ
ना आस रखां दुनियां ते ….
1. मैं ओथों मंगणा ऐ,
जिथों राजे वी मंगदे ने ओहदे कोलों मंगण तो,
कंगाल ना संगदे ने ओह देवे ना देवे,
ओहूदी रज़ा च रहना ऐ,
मैंनू जो कुछ चाहिदा ….
2. ओह मेरा शाफ़ी ऐ,
ओहदा फज़ल ही काफ़ी ऐ धो दित्ते पाप मेरे,
मैंनू बख्शी माफ़ी ऐ हर वेले नाल रहे,
मैं होर की लैणा ऐ,
मैंनू जो कुछ चाहिदा ….
3. ओह मेरा अय्याली ए,
ओहदी कब्र वी खाली ऐ ओह मम्बा ज़िन्दगी दा,
ओहदी शान निराली ऐ ओहदे कदमा च ज़िन्दगी ए,
मैं ओत्थे ही रहना ऐ,
मैंनू जो कुछ चाहिदा ….
1. केवल प्रभु यीशु पर भरोसा और सांसारिक आशाओं का त्याग (मुखड़ा)
गीत का मुख्य विषय यही है कि एक विश्वासी इस संसार की धन-दौलत या इंसानी वादों पर भरोसा नहीं रखता। वह जानता है कि संसार की हर वस्तु नाशवान है, इसलिए वह अपनी हर आत्मिक और शारीरिक जरूरत के लिए केवल प्रभु यीशु मसीह की ओर देखता है।
इस सत्य को बाइबल के इन वचनों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है:
भजन संहिता 146:3-5 “तुम प्रधानों पर भरोसा न रखना, न किसी आदमी पर, क्योंकि उसमें उद्धार करने की शक्ति नहीं। उसका भी प्राण निकल जाएगा, वह भी मिट्टी में मिल जाएगा; उसी दिन उसकी सारी कल्पनाएं नाश हो जाएंगी। क्या ही धन्य है वह, जिसका सहायक याकूब का परमेश्वर है, और जिसकी आशा अपने परमेश्वर यहोवा पर लगी रहती है।”
फिलिप्पियों 4:19 “और मेरा परमेश्वर भी अपने उस धन के अनुसार जो महिमा के साथ मसीह यीशु में है, तुम्हारी हर एक जरूरत को पूरी करेगा।”
2. राजाओं का राजा और परमेश्वर की रज़ा (पहला अंतरा)
पहले अंतरे में परमेश्वर की महानता का वर्णन है। यीशु वह सर्वोच्च राजा है जिसके सामने पृथ्वी के बड़े-बड़े राजा और कंगाल दोनों एक समान हाथ फैलाते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विश्वासी प्रभु की संप्रभुता को स्वीकार करता है—चाहे प्रार्थना का उत्तर ‘हाँ’ में मिले या ‘ना’ में, वह हर हाल में परमेश्वर की इच्छा (रज़ा) में आनंदित रहता है।
इस विचार को प्रमाणित करने वाले मुख्य वचन निम्नलिखित हैं:
प्रकाशितवाक्य 19:16 “और उसके वस्त्र और जांघ पर यह नाम लिखा है: राजाओं का राजा और प्रभुओं का प्रभु।”
मत्ती 6:10 “तेरा राज्य आए; तेरी इच्छा (रज़ा) जैसी स्वर्ग में पूरी होती है, वैसे ही पृथ्वी पर भी हो।”
Job (अय्यूब) 1:21 “मैं अपनी मां के पेट से नंगा निकला, और वहीं नंगा लौट जाऊंगा; यहोवा ने दिया और यहोवा ही ने लिया; यहोवा का नाम धन्य हो।”
3. शाफ़ी खुदा, अनुग्रह और पापों की क्षमा (दूसरा अंतरा)
दूसरे अंतरे में यीशु को ‘शाफ़ी’ (चंगाई देने वाला) और पापों से मुक्तिदाता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। विश्वासी स्वीकार करता है कि मसीह का अनुग्रह (फज़ल) उसके जीवन के लिए काफी है। जब यीशु की उपस्थिति हर समय साथ है, तो संसार में किसी और चीज़ की चाह बाकी नहीं रह जाती।
परमेश्वर के वचन में इस अनुग्रह और चंगाई को इस प्रकार लिखा गया है:
2 कुरुन्थियों 12:9 “और उसने मुझसे कहा, ‘मेरा अनुग्रह (फज़ल) तेरे लिये बहुत है; क्योंकि मेरी सामर्थ्य निर्बलता में सिद्ध होती है।’ इसलिये मैं मसीह की सामर्थ्य के लिये अपनी निर्बलताओं पर बहुत आनंद से घमंड करूंगा।”
कुलुस्सियों 1:14 “जिसमें हमें छुटकारा अर्थात् पापों की क्षमा (माफ़ी) मिलती है।”
मत्ती 28:20 “…और देखो, मैं जगत के अंत तक सदैव तुम्हारे साथ हूँ।”
4. सच्चा चरवाहा, पुनरुत्थान और जीवन का सोता (तीसरा अंतरा)
आखिरी अंतरे में मसीही विश्वास की सबसे बड़ी गवाही है—यीशु हमारा ‘अय्याली’ (चरवाहा) है और उसकी कब्र खाली है (वह जी उठा है)। वह ‘मम्बा’ यानी जीवन का झरना या सोता है। विश्वासी अपने जीवन को मसीह के पवित्र चरणों में समर्पित करके हमेशा वहीं बने रहने का संकल्प लेता है।
इस महान सत्य को बाइबल के इन वचनों में देखा जा सकता है:
यूहन्ना 10:11 “अच्छा चरवाहा (अय्याली) मैं हूँ; अच्छा चरवाहा भेड़ों के लिये अपना प्राण देता है।”
मत्ती 28:6 “वह यहाँ नहीं है, क्योंकि अपने वचन के अनुसार जी उठा है। आओ, यह स्थान देखो जहाँ प्रभु लेटाया गया था।”
यूहन्ना 14:6 “यीशु ने उससे कहा, ‘मार्ग और सत्य और जीवन (ज़िन्दगी) मैं ही हूँ; बिना मेरे द्वारा कोई पिता के पास नहीं पहुँच सकता।'”
