आ मेरे तू मन में Lyrics song
आ मेरे तू मन में, मुझको तू अपने जैसा बना
महिमा तेरी मैं कर सकूं, अपने होंटो से ऐसा बना
आ मेरे तू मन में…..
1. सुन सकूं तेरी मै बातों को, खोल दे कानों को ऐसा बना
महिमा तेरी मै गा सकूं, अपने जीवन से ऐसा बना
आ मेरे तू मन में……
2. देख सकूं तेरे ही कामो को, खोल दे आंखों के ऐसा बना
आ मेरे तू मन में, मुझको तू अपने जैसा बना
महिमा तेरी मैं कर सकूं, अपने होंटो से ऐसा बना
आ मेरे तू मन में….
3. शमूएल ने सुना था बातों को, मैं भी सुन सकूं ऐसा बना
आ मेरे तू मन में, मुझको तू अपने जैसा बना
महिमा तेरी मैं कर सकूं, अपने होंटो से ऐसा बना
आ मेरे तू मन में….
गीत का आत्मिक सारांश और बाइबल वचन (स्पष्टीकरण)
यह आराधना गीत एक विश्वासी के हृदय की उस गहरी पुकार को दर्शाता है, जहाँ वह अपने जीवन को पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा के अनुसार ढालना चाहता है। इस गीत का मुख्य सार यह है कि हमारा जीवन, हमारे होंठ, हमारी आँखें और हमारे कान सब कुछ प्रभु की महिमा का कारण बनें और हम मसीह के स्वरूप में बदलते जाएँ। आइए बाइबल के वचनों के आधार पर इसके गहरे अर्थ को समझें:
1. मसीह के स्वरूप में बदलना और होंठों से महिमा (स्थाई भाव)
गीत की मुख्य पंक्ति है कि प्रभु हमारे मन में आए और हमें अपने जैसा बनाए, ताकि हमारे होंठों से उसकी महिमा हो। जब यीशु हमारे हृदय में वास करता है, तो हमारा स्वभाव बदलने लगता है और हमारा उठना-बैठना, बोलना सब मसीह जैसा हो जाता है।
बाइबल हमें सिखाती है कि परमेश्वर ने हमें अपने पुत्र के स्वरूप में बदलने के लिए चुना है:
रोमियों 8:29 “क्योंकि जिन्हें उसने पहले से जान लिया है, उन्हें पहले से ठहराया भी है कि उसके पुत्र के स्वरूप में हों, ताकि वह बहुत से भाइयों में पहिलौठा ठहरे।”
हमारे होंठों से केवल प्रशंसा और धन्यवाद निकलना चाहिए, जैसा कि वचन में लिखा है:
इब्रानियों 13:15 “इसलिए हम उसके द्वारा स्तुति रूपी बलिदान, अर्थात् उन होठों का फल जो उसके नाम का अंगीकार करते हैं, परमेश्वर को सर्वदा चढ़ाया करें।”
2. आत्मिक कानों का खुलना और जीवन से महिमा (अंतरा 1)
पहले अंतरे में प्रार्थना है कि प्रभु हमारे आत्मिक कानों को खोले ताकि हम उसकी गुप्त और गहरी बातों को सुन सकें, और हमारा जीवन खुद एक जीवित गवाही बन जाए।
प्रभु यीशु मसीह ने बार-बार आत्मिक रूप से सुनने पर ज़ोर दिया:
मत्ती 11:15 “जिसके सुनने के कान हों वह सुन ले।”
जब हम परमेश्वर के वचन को सुनते और मानते हैं, तो हमारा जीवन उसकी महिमा करता है:
मत्ती 5:16 “उसी प्रकार तुम्हारी ज्योति मनुष्यों के सामने चमके कि वे तुम्हारे भले कामों को देखकर तुम्हारे पिता की, जो स्वर्ग में है, बड़ाई करें।”
3. आत्मिक आँखों का खुलना और परमेश्वर के कामों को देखना (अंतरा 2)
दूसरे अंतरे में याचना की गई है कि प्रभु हमारी आत्मिक आँखों को खोले ताकि हम इस संसार की व्यर्थ चीज़ों को देखने के बजाय परमेश्वर के अद्भुत कामों, उसके आश्चर्यकर्मों और उसकी योजनाओं को देख सकें।
भजनकार ने अपनी आँखों को खोले जाने के लिए इस प्रकार प्रार्थना की थी:
भजन संहिता 119:18 “मेरी आँखें खोल दे, कि मैं तेरी व्यवस्था की अद्भुत बातें देख सकूँ।”
प्रेरित पौलुस भी विश्वासियों के लिए यही प्रार्थना करते हैं कि उनकी आत्मिक समझ की आँखें खुल जाएँ:
इफिसियों 1:18 “और तुम्हारे मन की आँखें ज्योतिर्मय हों कि तुम जान लो कि उसकी बुलाहट की आशा क्या है, और पवित्र लोगों में उसकी मीरास की महिमा का धन कैसा है।”
4. शमूएल के समान आज्ञाकारी हृदय और परमेश्वर की आवाज़ सुनना (अंतरा 3)
तीसरे अंतरे में बाइबल के महान नबी शमूएल का उदाहरण दिया गया है। जब शमूएल बालक था, तब उसने मंदिर में परमेश्वर की आवाज़ को सुना और पूरी नम्रता के साथ जवाब दिया। यह अंतरा हमें सिखाता है कि हमें भी शमूएल की तरह खोजी और संवेदनशील हृदय रखना चाहिए ताकि जब खुदावंद हमसे बात करे, तो हम सुन सकें।
बाइबल में शमूएल का यह प्रसंग इस प्रकार दर्ज है:
1 शमूएल 3:10 “तब यहोवा आकर खड़ा हुआ, और पहले की नाईं पुकारा, ‘शमूएल! शमूएल!’ शमूएल ने कहा, ‘बोल, क्योंकि तेरा दास सुन रहा है।'”
यीशु ने भी अपने भेड़ों (विश्वासियो) के बारे में यही कहा कि वे उसकी आवाज़ पहचानती हैं:
यूहन्ना 10:27 “मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं, और मैं उन्हें जानता हूँ, और वे मेरे पीछे-पीछे चलती हैं।”


